राष्ट्रीय न्यास

राष्ट्रीय न्यास स्वपरायणता, प्रमस्तिष्कघात, मानसिक मंदता और बहु-विकलांगताग्रसित व्यक्तियों के कल्याण के लिए

क्षमता विकास, बढ़ाएं विश्वास
Menu
भारत की विकास यात्रा को नवीन ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए हमें आपके सहयोग, आशीर्वाद और आपकी सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा है। " signature

अभिभावकता

कानूनी संरक्षकता आवेदन के लिए क्लिक करें

अभिभावकता क्या है?

एक अभिभावक वह व्यक्ति होता है, जो किसी अन्य व्यक्ति या उसकी संपत्ति की देखभाल करने के लिए नियुक्त किया जाता है। अभिभावक के रुप में नियुक्त व्यक्ति पर देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी होती है। व्यक्ति तथा व्यक्ति की संपत्ति से संबंधित सभी कानूनी निर्णय अभिभावक लेता है। किसी अन्य व्यक्ति की देखभाल या अभिभावकता कि जिम्मेदारी व्यक्ति के नाबालिग या 18 वर्ष कि उम्र पूर्ण न होने पर ली जाती है। इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति में किसी प्रकार कि शारीरिक या मानसिक कमियाँ है और वह खुद की या अपनी संपत्ति की देखभाल करने में असमर्थ है, तो उसके लिए एक अभिभावक नियुक्त किया जा सकता है। प्रारंभिक काल से ही सभी समाज में नाबालिग के लिए अभिभावक की नियुक्ति आवश्यक रही है। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि एक नाबलिग को अपने खुद के लिए निर्णय लेने के अयोग्य माना जाता है, जो इसके लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। इसलिए, कानून में भी एक नाबलिग व्यक्ति के साथ एक वयस्क व्यक्ति कि तुलना में अयोग्य के रूप में व्यवहार किया जाता है। इसलिए सभी मामलों में, एक नाबालिग भी अपने अभिभावक के माध्यम को छोड़कर खुद का प्रतिनिधित्व करने में अयोग्य माना गया है। एक अभिभावक नाबालिग और उसकी संपत्ति के हितों की रक्षा के लिए नाबालिग की ओर से निर्णय लेता है।

स्रोत - अभिभावकता और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890। भारतीय संविदा अधिनियम - 1872। मानसिक स्वास्थ्यता अधिनियम 1987।

स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता और बहु – निःशक्तताग्रस्त व्यक्तियों की विशेष स्थिति

स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता और बहु – निःशक्तताग्रस्त व्यक्ति 18 वर्ष की आयु पूर्ण न होने तक एक विशेष स्थिति में रहते हैं, क्योंकि वे स्वयं के जीवन प्रबंध और स्वयं की भलाई के लिए कानूनी निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते हैं। इसलिए, उन्हें आजीवन कानूनी क्षेत्रों में उनके हितों की रक्षा करने के लिए किसी की आवश्यकता हो सकती है। हालांकि, वैज्ञानिक तंत्र और/या सुविधाओं की उपलब्धता के कारण प्रमस्तिष्क घात और बहु-निःशक्तता के मामलों में, अभिभावकता की जरूरत सीमित हो सकती है, जो दिव्यांगजन को स्वतंत्रता पूर्वक जीवन यापन करने में सक्षम कर सकते हैं।

स्रोत - विकलांगता के विशेषज्ञों की राय के अनुसार राष्ट्रीय न्यास के तहत विकलांगता की ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनका उपचार नहीं किया जा सकता और वे कोई बीमारी भी नहीं है। सहायक विधि सलाहकार की कानूनी सलाह के अनुसार।

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम के तहत अभिभावकता

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम की धारा 14 के तहत, जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में स्थानीय स्तरीय समिति को नियम 16 (1) के तहत प्रपत्र क में आवेदन प्राप्त करने और स्वपरायणता, प्रमस्तिष्क घात, मानसिक मंदता और बहु – निःशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के लिए नियम 16 (2) के फार्म बी के तहत अभिभावकों की नियुक्ति का अधिकार है। इसके अलावा निगरानी और गुणों सहित उनके हितों की रक्षा के लिए तंत्र भी प्रदान करता है।

अभिभावक की जरुरत क्यों

  1. कानूनी निर्वाहित  एवं संरक्षता को भरने के लिए, क्योंकि संरक्षकता के अन्य कानून केवल नाबालिगों के लिए कार्य कर रहे हैं।
  2. सही निर्णय करने के लिए दिव्यांगजनों में क्षमता विकास। 

स्रोत – सहायक विधि सलाहकार की कि कानूनी सलाह के अनुसार।

अभिभावक के कार्य

धारा 16 (1) में अभिव्यक्त किया गया है, की "धारा 14 के तहत अभिभावक के रूप में नियुक्त हर व्यक्ति को उसकी नियुक्ति की तारीख से छह महीने के भीतर जिस प्राधिकरण ने उसे नियुक्त किया है उसे दिव्यांगजन द्वारा किए गए सभी दावों, सभी ऋण और देनदारियों के ब्यौरे के साथ दिव्यांगजन से संबंधित अचल संपत्ति और सभी परिसंपत्तियों तथा उसके द्वारा प्राप्त अन्य चल संपत्तियों की सूची प्रस्तुत कि जानी चाहिए।"  

धारा 16 (2) में अभिव्यक्त किया गया है, की  "प्रत्येक अभिभावक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के तीन महीने के भीतर नियुक्ति प्राधिकारी को दिव्यांगजन की संपत्ति और संपत्ति का खाता, प्राप्त रकम और दिव्यांगजन के खाते में शेष राशि का विवरण प्रस्तुत करेगा।"

अभिभावकता के लिए कौन आवेदन कर सकता है?

विनियम की धारा 11  

  1. अभिभावक के लिए माता-पिता दोनों को संयुक्त रूप से, या मृत्यु, तलाक, कानूनी त्याग, परित्याग या सजा के कारण किसी एक के अभाव की स्थिति में अकेले के संरक्षण के लिए आवेदन कर सकते हैं या 18 वर्ष से अधिक की आयु के मामले में आवेदन कर सकते हैं।
  2. मौत, परित्याग, माता-पिता दोनों की सजा के मामलें में भाई-बहन (सौतेले भाई बहन सहित)
    संयुक्त रूप से या अकेले (एकल आवेदन के कारण को अलग से समझाया जा सकता है) परिवार के एक दिव्यांग सदस्य के संरक्षण के लिए आवेदन कर सकते हैं।
  3. ऊपर वर्णित उप-विनियम (1) और (2) के अनुसार गैर-आवेदन के मामलें में, रिश्तेदार अभिभावकता के लिए आवेदन कर सकता है।
  4. स्थानीय स्तरीय समिति बेसहारा या परित्यक्त व्यक्ति के मामले में अभिभावकता के लिए प्रत्यक्षत रुप से पंजीकृत संगठन को आवेदन करने के लिए कह सकती है। 

विनियम की धारा 12 - आवेदक में से अभिभावक के रूप में किसे निर्दिष्ट किया जा सकता है?

  1. माता-पिता दोनों संयुक्त रूप से या या मृत्यु, तलाक, कानूनी त्याग, परित्याग या सजा के कारण किसी एक के अभाव की स्थिति में अकेले नाबालिग के प्राकृतिक अभिभावकता के लिए या उनकी संरक्षक के रूप में नियुक्ति या जैसा भी मामला हो, स्थानीय स्तरीय समिति को आवेदन कर सकते हैं,  इन मामलों में माता-पिता आवेदन स्वीकार किया जाएगा या इन निम्न कारणों से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा-
  1. नागरिकता के समाप्त होने;
  2. मानसिक अस्वस्थता के मामलें में;
  3. किसी अदालत द्वारा किसी मामलें में दोषी ठहराने; या
  4. निराश्रित होने की स्थिति में।
  1. आवेदक का कोई भी हो सकता है जैसे भाई-बहन या परिवार का कोई भी सदस्य या कोई अन्य व्यक्ति या पंजीकृत संस्था को अभिभावक के रूप में निर्दिष्ट किया जा सकता है और संस्थाओं के मामले में, संस्थानों की पात्रता की शर्तों को उप नियमों (3), (4) और (5) के रूप में निर्धारित किया जाएगा।
  2. अभिभावक के रूप में संस्था पर विचार के मामले में, संस्था को कानून के तहत पंजीकृत और व्यक्ति को देखभाल प्रदान करने में सक्षम होना जरूरी है।
  3. कानून के तहत पंजीकृत संस्था के बंद हो जाने या कार्य बंद हो जाने या अन्यथा अनुपयुक्त होने की स्थिति में स्थानीय स्तरीय समिति को किसी ऐसे निवासी या वार्ड के पालक देखभाल के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी होंगी, जो किसी भी तरह के संस्थान की देखरेख में है।
  4. उप-विनियम (4) के तहत वैकल्पिक देखभाल कि प्रकृति स्थायी नहीं होगी और एक वर्ष की अवधि के भीतर उसे स्थायी संरक्षण में रखा जाएगा।
  5. आवेदक को आसपास या अभिभावक की नियुक्ति के समय वार्ड के क्षेत्र में रहने वाला होना चाहिए।
  6. एकल पुरुष को महिला वार्ड का अभिभावक नियुक्त नहीं किया जाएगा और महिला वार्डों के मामले में, पुरुष को उसकी पत्नी के साथ सह-अभिभावकता दी जाएगी, जोकी सह-अभिभावक होगा।

फार्म ‘ए’ के साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज़

संरक्षकता को तय करने के लिए स्थानीय स्तरीय समिति के पास राष्ट्रीय न्यास की धारा 13 (2) के अनुसार किसी भी समर्थन दस्तावेज को जमा करने या प्रस्तुत किया जा सकता है  तदनुसार, फार्म-ए के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले समर्थन दस्तावेजों की मार्गदर्शक सूची नीचे दी गई है।

नियुक्त अभिभावक के लिए अनुज्ञा फॉर्म डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें।   [52.03 KB]

अभिभावक के लिए अनुज्ञा फॉर्म डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें।    [43.56 KB]

  1. दिव्यांगजन का जन्म प्रमाणपत्र, जिसे नगर निगम के प्राधिकारी/जन्म पंजीयक/स्कूल प्राधिकारी/शैक्षिक बोर्ड द्वारा जारी किया जा सकता है।
  1. दिव्यांगजन का निवास प्रमाण पत्र, जिसे राशन कार्यालय, निर्वाचन आई.डी. कार्ड, पासपोर्ट कार्यालय द्वारा जारी किया जा सकता है। 18 वर्ष की आयु तक के दिव्यांगजन का निवास प्रमाण-पत्र दिव्यांगजन के पिता के नाम पर जारी राशन कार्ड के रुप में मान्य होगा। अगर किसी कारण वश निवास का पता बदल गया है, तो  पता स्थानान्तरण से संबंधी दस्तावेज समिति को प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
  1. किसी भी मेडिकल बोर्ड या राज्य या केन्द्र सरकार के प्राधिकारी/सरकारी अस्पताल/सरकारी मनोरोग अस्पताल/अधिकृत सरकारी डॉक्टर/विशेषज्ञ द्वारा जारी विकलांगता प्रमाण पत्र।
  1. अभिभावक के रूप में नियुक्त किए जाने वाले किसी स्वैच्छिक संगठन या संस्था के मामले में, माता-पिता की सहमति को आवेदन फार्म में निर्दिष्ट किया जाना चाहिए।
  1. आवेदक द्वारा मूल दस्तावेज जमा करना आवश्यक नहीं है। दस्तावेज की स्व-प्रमाणित प्रति प्रस्तुत की जा सकती है और समिति द्वारा आवश्यक होने पर सत्यापन के लिए मूल प्रति की माँग की जा सकती है।   
  1. आवेदक द्वारा व्यक्तिगत रुप से आवेदन जमा करने के लिए भी इन दस्तावेजों को प्रस्तुत करना आवश्यक है (जहाँ इस तरह के आवेदन व्यक्तिगत रुप से प्रस्तुत किए जाते हैं)।  इसके लिए आवेदन फार्म में निर्दिष्ट किया जा सकता है या अतिरिक्त शीट का इस्तेमाल किया जा सकता है। जहाँ आवेदक के लिए व्यक्तिगत देखभाल की प्रकृति और सीमा तथा रखरखाव और चल व अचल संपत्ति का ब्यौरा जिसे अभिभावक द्वारा प्रबन्धित किया जा रहा है, का ब्यौरा देना आवश्यक है, वहाँ ऐसी संपत्तियों की स्थिति के प्रमाण के साथ इसे एक अतिरिक्त शीट में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
  1. अगर किसी पुरुष आवेदक द्वारा किसी महिला अभिभावकता के लिए संरक्षक की नियुक्ति के संबंध में आवेदन किया जाता है, तो उसके पति को सह-अभिभावक के रूप में नियुक्त किया जाना आवश्यक होगा। इस तरह के आवेदकों के लिए अपने पति या पत्नी का ब्यौरा प्रस्तुत करना आवश्यक होगा।

स्रोत - राष्ट्रीय न्यास नियमों के फार्म ए के तहत आवश्यक दिव्यांगजन की उम्र, विकलांगता श्रेणी और पता, जिसके लिए आवश्यक प्रमाण पत्रों का विवरण ऊपर दिया गया है।

   स्रोत - धारा 16 (1) के नियमों के साथ फार्म ए

   स्रोत - सहायक विधि सलाहकार की कानूनी सलाह के अनुसार

   स्रोत - राष्ट्रीय न्यास अधिनियम की धारा 11 (1) और (2)

   स्रोत - राष्ट्रीय न्यास अधिनियम की धारा 12 (7)

विनियम की धारा 13 - अभिभावक की नियुक्ति के लिए प्राप्त, प्रसंस्करण और आवेदन की कार्रवाई के दिशा-निर्देश

  1. स्थानीय स्तरीय समिति प्रपत्र ए के नियमों के तहत संरक्षक की नियुक्ति के लिए आवेदन पत्र प्राप्त करेगी। (संशोधित जीएसआर 123 (ई) देखें, दिनांकित 16 फ़रवरी 2004)
  1. अभिभावक की नियुक्ति के लिए आवेदन प्राप्त होने पर, स्थानीय स्तरीय समिति

आवेदन पत्रों की जाँच करेगी और अभिभावकता पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक किसी भी दस्तावेज या जानकारी की मांग कर सकती है।

  1. अगर दिव्यांगजन के माता-पिता किसी अन्य व्यक्ति को अभिभावक नियुक्त करने के लिए आवेदन करते हैं, तो स्थानीय स्तरीय समिति इस मामले में माता-पिता से परामर्श लेने पर विचार कर सकती है, इससे माता-पिता के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के अभिभावक होने की प्रामाणिकता का निर्धारण करने में मदद मिल सकती है।   
  2. किसी दिव्यांगजन के स्वेच्छाचारी या बेसहारा या परित्यक्त होने कि स्थिति में

अभिभावक की जरूरत होने पर अगर उसके माता-पिता या रिश्तेदार उपलब्ध नहीं हैं, तो समिति के सदस्य या सदस्यों द्वारा अभिभावकता की प्रक्रिया शुरू करने के लिए पंजीकृत संगठन से आवेदन के लिए कहा जा सकता है।   

  1. अभिभावकता की जरूरत का निर्धारण करने के लिए दिव्यांगजन का स्थानीय स्तरीय समिति द्वारा मूल्यांकन किया जाना चाहिए तथा यह तकनीकी कर्मियों की सहायता या दिव्यांगजन को सेवाओं की आवश्यकता का निर्धारण करने के लिए उपलब्ध होना चाहिए।
  2. स्थानीय स्तरीय समिति, जिस व्यक्ति को संरक्षकता प्रदान की जा रही है, उसकी अभिभावकता और उपयुक्तता के बारे में जाँच करेगी।
  3. अभिभावकता आवेदन को व्यक्तिगत देखभाल और पालन पोषण से संबंधित निम्नलिखित क्षेत्रों को ध्यान में रखकर करने के बाद ही स्वीकार किया जाएगाः-
  1. भोजन, कपड़े और आश्रय की जरूरत;
  2. स्वास्थ्य देखभाल की जरूरत;
  3. धार्मिक जरूरतें;
  4. शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार की जरूरत;
  5. आराम और पोषण की जरूरत;
  6. शोषण और उत्पीड़न से संरक्षण;
  7. संवैधानिक और मानव अधिकारों का संरक्षण; तथा चिकित्सा और शल्य चिकित्सा संबधी जरूरत। इत्यादि
  8. अभिभावक की नियुक्ति के लिए आवेदन (1) एक पंजीकृत संगठन; या (2) दिव्यांगजन के माता-पिता या रिश्तेदारों द्वारा फार्म बी के नियमों के तहत किया जाएगा। (संशोधित जीएसआर 123 (ई) देखें, दिनांकित 16 फ़रवरी 2004)

हार्ड कॉपी प्रणाली के अलावा, स्थानीय स्तरीय समितियों को अभिभावकता के लिए आवेदन करने तथा राष्ट्रीय कानूनी संरक्षकता प्रमाण-पत्र भंडार (एन.डी.एल.जी.सी.) में अभिभावक की नियुक्ति के लिए ऑनलाइन कानूनी अभिभावकता मॉड्यूल भी उपलब्ध है। 

घर का दौरा

  1. एक स्थानीय स्तरीय समिति की सफलता कानूनी अभिभावकता आवेदन की प्रामाणिक जानकारी, तथ्यों और आंकड़ो का अधिकरण करने में निहित है।
  2. कानूनी अभिभावकता के आवेदक द्वारा तथ्यों के दमन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, इसलिए घर का दौरा आकस्मिक होना महत्वपूर्ण है।
  3. यह अनिवार्य है कि घर के दौरे के दौरान स्थानीय स्तरीय समितियों तथा गैर सरकारी संगठन के सदस्य अधिमानतः दिव्यांगजन की वास्तविक स्थिति, जीविका की स्थिति, संपत्ति का विवरण, परिवार की गतिशीलता तथा दिव्यांगजन की कार्यात्मक क्षमता और स्तर की जाँच करें और दिव्यांगजन के सभी प्रासंगिक मुद्दों जैसे - परिवार तथा पड़ोस के विवादों सहित सभी अन्य जानकारियों के लिए परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ बात करें। घर के दौरे के दौरान प्राप्त सूचनाओं के आधार पर, स्थानीय स्तरीय समिति द्वारा दिव्यांगजन तथा उनके परिवार की समस्याओं का समाधान खोजने के लिए सरकारी अधिकारियों को चयनित किया जाता है तथा संबंधित मुद्दों के सौहार्दपूर्ण और स्थायी समाधान के लिए इन अधिकारियों, संबंधित परिवारों और अन्य सदस्यों को जिला जिलाधीश परिसर में सुनवाई में बुलाया जाता है।
  4. घर के दौरे के दौरान दिव्यांगजन और उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को प्रभावित करने से संबंधित समस्या की पहचान की जानी चाहिए और सुनवाई के दौरान पेश किया जाना चाहिए, ताकि जिला प्रशासन आवास पेंशन, बीमा, शिक्षा जैसी कल्याण से संबंधित मौजूदा योजनाओं में से किसी के तहत दिव्यांगजन या उसके परिवार के सदस्यों की मदद कर सके।
  5. यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि स्थानीय स्तरीय समितियों द्वारा उच्च न्यायालय में रिट याचिकाओं और घर के दौरे की रिपोर्ट के रूप में बनाए गए दस्तावेज मूल्यवान होते हैं, जो दिव्यांगजन के अधिकारों को सुनिश्चित करते हैं।
  6. इसलिए घर के दौरे के दौरान तैयार की गई रिपोर्ट, यहाँ तक कि स्थानीय स्तरीय समिति के सदस्यों के सूक्ष्मतम डेटा को भी अच्छी तरह से तैयार किया जाना चाहिए।
  7. फार्म ‘ए’ के दो भाग हैं (भाग - ए और भाग - बी - अनुबंध 2) जिसे फार्म के उद्देश्य को स्पष्ट करके स्थानीय स्तरीय समिति के संयोजक द्वारा आवेदक को सौंप दिया जाता है।
  8. इस फार्म के भाग ए में आवेदन के प्रसंस्करण के लिए आवश्यक दस्तावेजों की जाँच आवश्यक है। आवेदक द्वारा पहले से उपलब्ध दस्तावेजों और आवश्यक दस्तावेजों की जमा प्रतियों के बारे में विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
  9. फार्म के भाग-बी में दिव्यांगजन के हिस्से वाली चल और अचल संपत्तियों के बारे में जानकारी प्रस्तुत की जाती है। प्रपत्र के इस भाग को आवेदक द्वारा हस्ताक्षरित और ग्राम अधिकारी द्वारा प्रमाणित करना आवश्यक है, ताकि इस दस्तावेज को महत्वपूर्ण भाग के रूप में रिकार्ड के लिए रखा जा सके, यदि आवश्यक हो तो कानूनी अभिभावकता प्रमाण पत्र में संपत्ति का विवरण भी भरें।
  10. आवेदक को स्पष्ट रूप से सूचित किया जाता है कि दस्तावेजों के किसी भी प्रकार के सत्यापन की जरूरत नहीं है और केवल प्रमाणित फोटोस्टेट प्रतियाँ ही प्रर्याप्त हैं। इसके अलावा आवेदक को फार्म के ए और बी भाग के पूर्ण हो जाने के पश्चात् व्यक्तिगत रुप से कार्यालय में फार्म और दस्तावेजों को जमा करने की सुविधा के लिए स्थानीय स्तरीय समिति के संयोजक को फोन करने की सलाह दी जाती है।
  11. नियुक्त कानूनी अभिभावक की निगरानी के लिए दिव्यांगजन के आसपास एक अतिरिक्त व्यवस्था/सूचना स्रोत की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  12. माता-पिता और लाभार्थियों को राष्ट्रीय न्यास के पहले स्तर से सूचना के प्रसार के लिए पंचायत वार व्यक्ति की पहचान की जानी चाहिए।

स्रोत-  बोर्ड की 49 वीं बैठक जो 4 अप्रैल 2012 को आयोजित की गई थी, इस बैठक में राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 के तहत अभिभावकों की नियुक्ति के क्षेत्र का दौरा करने के मुद्दे पर श्री वेणुगोपालन की व्यावहारिक निरीक्षण के आधार पर बोर्ड के तत्कालीन ट्रस्टी और स्थानीय स्तरीय समिति गैर सरकारी संगठन के सदस्य कोल्लम, केरल के साथ विस्तार से चर्चा हुइ थी। इसलिए बोर्ड ने सभी स्थानीय स्तरीय समितियों को बोर्ड द्वारा लागू  प्रक्रिया को अपनाने की सिफारिश करने का फैसला किया तथा स्थानीय स्तरीय समिति के लिए घर के दौरे के खर्च को भी निधि वितरण के तहत शामिल किया।

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम की धारा 17 - अभिभावक का स्थानान्तरण

  1. अगर माता-पिता या दिव्यांगजन के रिश्तेदार या पंजीकृत संगठन द्वारा यह ज्ञात होता है की दिव्यांगजन का अभिभावक द्वारा -  
  • दिव्यांगजन के साथ दुर्व्यवहार या उसकी उपेक्षा; या 
  • संपत्ति के दुस्र्पयोग या उपेक्षा कि जाती है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इस तरह के अभिभावक को हटाने के लिए समिति को आवेदन कर सकते हैं। 
  1. ऐसे आवेदन प्राप्त होने पर अगर समिति द्वारा यह ज्ञात होता है की अभिभावक का स्थानान्तरण करना आवश्यक है और स्थानान्तरण के कारणों को लिखित रूप से दर्ज करने के बाद, दिव्यांगजन कि देखभाल और अभिभावकता के लिए अभिभावक को हटाने और उसके स्थान पर एक नया अभिभावक नियुक्त करने या अगर कोई अभिभावक उपलब्ध नहीं है तो अन्य व्यवस्था कि जाती है।
  2. उप-धारा (2) के तहत हटाया गया कोई भी अभिभावक नए अभिभावक को दिव्यांगजन की संपत्ति और उसके द्वारा प्राप्त या वितरित धन का प्रभार देने के लिए बाध्य नहीं होगा।

स्पष्टीकरण - इस अध्याय में अभिव्यक्ति "रिश्तेदार" शब्द में रक्त, शादी या गोद द्वारा दिव्यांगजन से संबंधित व्यक्ति भी शामिल है।

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम की धारा 17 - अभिभावक के स्थानान्तरण की प्रक्रिया

  1. दिव्यांगजन के माता-पिता या रिश्तेदार या पंजीकृत संगठन से अभिभावक को हटाने के लिए आवेदन प्राप्त करने के बाद स्थानीय स्तरीय समिति अधिनियम की धारा 17 की उप-धारा (1) के खंड (क) और (ख) के आधार पर, कम से कम तीन व्यक्तियों की जांचकर्ता टीम को नियुक्त करेगी।
  2. यह टीम माता-पिता से संबंधित संगठन के एक प्रतिनिधि, दिव्यांगों से संबंधित संस्था के एक प्रतिनिधि और विकलांगता से जुड़े एक सरकारी अधिकारी से मिलकर बनेगी। टीम के सदस्यों का पद सहायक निदेशक से नीचे नहीं होना चाहिए।
  3. अभिभावक की नियुक्ति पर कोई फैसला लेते समय, स्थानीय स्तरीय समिति यह सुनिश्चित करेगी कि अभिभावक के रूप में जिसके नाम का सुझाव दिया गया है, वह:-
  • भारत का नागरिक हो;
  • मानसिक रुप से अस्वस्थ न हो या वर्तमान में मानसिक बीमारी का इलाज न चल रहा हो;
  • इसका कोई आपराधिक इतिहास न हो;
  • बेसहारा न हो और जीवन निर्वाह के लिए दूसरों पर निर्भर न हो; और
  • दिवालिया घोषित न किया गया हो।
  1. स्थानीय स्तरीय समिति द्वारा किसी संस्था या संगठन को अभिभावक कि नियुक्ति के लिए निर्दिष्ट करने के मामले में, निम्नलिखित दिशा निर्देशों का पालन किया जाएगा:
  • संस्था को राज्य या केन्द्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त होना चाहिए;
  • संस्था को दिव्यांगजनों से संबंधित सी'श्रेणी के लिए आवासीय या छात्रावास;
  • सुविधाओं सहित विकलांगता पुनर्वास सेवाओं का कम से कम 2 वर्ष का अनुभव होना चाहिए;
  • दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आवासीय सुविधा या छात्रावास में बोर्ड द्वारा निर्दिष्ट पर्याप्त स्थान, स्टाफ, फर्नीचर, पुनर्वास और चिकित्सा सुविधाओं के न्यूनतम मानकों को बनाए रखा जाना चाहिए। जांचकर्ता टीम जो दिव्यांगजन के दुरुपयोग या उपेक्षा के शिकायत की जांच कर रही है, उसे बोर्ड द्वारा निर्दिष्ट दिशा निर्देशों का पालन करना चाहिए।
  1. आयोग के अधिनियमों के अनुसार अभिभावक की ओर से निम्नलिखित कार्य दिव्यांगजन के प्रति दुरुपयोग या उपेक्षा कि श्रेणी में आएंगे –
  • लंबे समय तक दिव्यांगजन को एक कमरे में रखना;
  • दिव्यांगजन का श्रृंखलन (चैनिंग); 
  • पिटाई या दुर्व्यवहार जिसके परिणामस्वरूप दिव्यांगजन के शरीर पर चोट के निशान हो या उसकी त्वचा या ऊतकों को नुकसान हो (यह निशान दिव्यांगजन के खुद के हानिकारक व्यवहार की वजह से नहीं होना चाहिए);
  • यौन शोषण;
  • दिव्यांगजन को लंबी अवधि तक भोजन, पानी और कपड़े जैसी भौतिक आवश्यकताओं का अभाव; विकलांगता पुनर्वास के क्षेत्र में विशेषज्ञों द्वारा निर्दिष्ट प्रावधान या पुनर्वास या प्रशिक्षण कार्यक्रमों का पालन न करना।
  • दिव्यांगजन की संपत्ति की हेराफेरी या गलत उपयोग; और
  • सुविधाओं की कमी या दिव्यांगजन के प्रशिक्षण और प्रबंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रशिक्षित या पर्याप्त स्टाफ का प्रावधान न करना।
  1. जांचकर्ताओं की टीम दस दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।
  2. जांच टीम से रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद, जिस अभिभावक के खिलाफ शिकायत की गई है उसे सुनवाई का अवसर देने के बाद स्थानीय स्तरीय समिति अभिभावक को हटाने पर निर्णय दस दिनों की अवधि के भीतर लेगा।
  3. स्थानीय स्तरीय समिति आवेदन के अस्वीकृति या अभिभावक को हटाने के कारणों का लिखित रिकॉर्ड रखेगी। 

 

अंतिम नवीनीकृत: 05-07-2021

आगंतुक संख्या: 382743